National Handloom Day पर PM Modi ने भारतीय हथकरघा विरासत और बुनकरों के योगदान को सराहा। जानिए हथकरघा वीडियो शेयर करने और स्थानीय बुनकरों को समर्थन देने की अपील के बारे में।
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर PM मोदी की अपील: हथकरघा के वीडियो शेयर करें, बुनकरों को दें समर्थन
नई दिल्ली: राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की समृद्ध हथकरघा विरासत को याद करते हुए बुनकरों और कारीगरों के योगदान की सराहना की। प्रधानमंत्री ने नागरिकों से भारतीय हथकरघा की खूबसूरती और उससे जुड़े लोगों की मेहनत को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने का आह्वान किया।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत की हथकरघा परंपरा केवल कपड़े बनाने की कला नहीं है, बल्कि यह देश की सांस्कृतिक विरासत, स्थानीय पहचान और पीढ़ियों से चली आ रही कारीगरी का प्रतीक है।
सोशल मीडिया पर हथकरघा वीडियो शेयर करने की अपील
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के मौके पर हथकरघा उत्पादों और उन्हें तैयार करने वाले कारीगरों को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया। नागरिकों से आग्रह किया गया कि वे भारतीय हथकरघा से जुड़े वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा करें।
इस तरह की पहल का उद्देश्य देश के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद पारंपरिक बुनाई की कला को व्यापक पहचान दिलाना और नई पीढ़ी को भारतीय हथकरघा से जोड़ना है।सोशल मीडिया के माध्यम से स्थानीय बुनकरों की कहानियां, उनकी कार्यप्रणाली और उनके उत्पादों को सामने लाने से संभावित ग्राहकों तक उनकी पहुंच बढ़ सकती है।
बुनकरों और कारीगरों की मेहनत को किया सलाम
प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर भारत के बुनकरों और कारीगरों के कौशल, रचनात्मकता और समर्पण की सराहना की। उन्होंने कहा कि इन कारीगरों ने पीढ़ियों से देश की पारंपरिक कला और संस्कृति को संरक्षित एवं समृद्ध किया है।
भारत के अलग-अलग राज्यों में हथकरघा की अपनी विशिष्ट पहचान है। कहीं साड़ियां प्रसिद्ध हैं तो कहीं शॉल, दुपट्टे, कपड़े और पारंपरिक वस्त्र अपनी खास बुनाई और डिजाइन के लिए जाने जाते हैं।
हथकरघा क्षेत्र का आर्थिक महत्व
हथकरघा क्षेत्र भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार के लिए भी महत्वपूर्ण है। सरकारी जानकारी के अनुसार, देश के हथकरघा क्षेत्र से लगभग 35 लाख लोग जुड़े हुए हैं, जिससे यह कृषि के बाद रोजगार देने वाले प्रमुख क्षेत्रों में शामिल है।
हथकरघा उद्योग विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले कारीगरों और महिलाओं के लिए आजीविका का महत्वपूर्ण साधन है। स्थानीय स्तर पर तैयार होने वाले उत्पादों को बाजार मिलने से बुनकर परिवारों की आय और आर्थिक स्थिति को मजबूती मिल सकती है।
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस क्यों मनाया जाता है?
भारत में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस हर साल 7 अगस्त को मनाया जाता है। इस दिन को 1905 के स्वदेशी आंदोलन की याद से जोड़ा जाता है। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का आयोजन पहली बार 7 अगस्त 2015 को किया गया था।
इस दिवस का उद्देश्य भारत की हथकरघा परंपरा को सम्मान देना, बुनकरों और कारीगरों के योगदान को पहचान दिलाना तथा लोगों को भारतीय हथकरघा उत्पादों के प्रति जागरूक करना है।
‘वोकल फॉर लोकल’ को मिल सकता है बढ़ावा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने और भारतीय उत्पादों को अपनाने की अपील करते रहे हैं। हथकरघा को बढ़ावा देना इसी सोच से जुड़ा हुआ है।
यदि लोग स्थानीय बुनकरों से बने उत्पाद खरीदते हैं, तो इसका सीधा लाभ कारीगरों और उनके परिवारों तक पहुंच सकता है। साथ ही, इससे भारत की पारंपरिक बुनाई और शिल्प को नई पीढ़ी के बीच लोकप्रिय बनाने में मदद मिल सकती है।
युवाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण
हथकरघा क्षेत्र को आधुनिक दौर में नई पहचान दिलाने में युवाओं और डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। सोशल मीडिया पर हथकरघा उत्पादों के वीडियो, रील्स और तस्वीरें साझा करने से पारंपरिक कला को देश और दुनिया के नए दर्शकों तक पहुंचाया जा सकता है।
इसके अलावा, ई-कॉमर्स और डिजिटल मार्केटिंग के माध्यम से बुनकर अपने उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचा सकते हैं।
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस भारत की समृद्ध बुनाई परंपरा और लाखों बुनकरों की मेहनत को सम्मान देने का अवसर है। प्रधानमंत्री मोदी की अपील से हथकरघा उत्पादों और कारीगरों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अधिक visibility मिलने की उम्मीद है।
हथकरघा खरीदना, स्थानीय बुनकरों का समर्थन करना और उनकी कला को सोशल मीडिया पर साझा करना छोटे कदम हो सकते हैं, लेकिन इनसे भारतीय पारंपरिक कारीगरी को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान मिल सकता है।
